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महाकाल की पंचम सवारी में देशभक्ति की गूंज: तिरंगों से सजा उज्जैन, पुलिस और सशस्त्र बल ने दी सलामी; राइफल्स पर लहराया तिरंगा!
उज्जैन लाइव, उज्जैन, श्रुति घुरैया:
उज्जैन में भगवान महाकाल की भादौ माह की पहली सवारी सोमवार शाम भव्य और अनोखे अंदाज़ में निकली, जिसमें आध्यात्मिक आस्था के साथ देशभक्ति का रंग भी घुला हुआ नज़र आया। सावन माह में चार सवारियों के बाद यह पंचम सवारी थी, जो 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस से मात्र चार दिन पहले आयोजित हुई। मंदिर से पालकी के प्रस्थान के समय सशस्त्र बल की टुकड़ी ने भगवान महाकाल को सलामी दी। विशेष बात यह रही कि इस बार सलामी देने वाले जवानों की राइफल्स पर तिरंगा लहराया, वहीं पुलिस का घुड़सवार दल भी हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर आगे बढ़ रहा था। सवारी में शामिल कई भजन मंडलियां भी तिरंगा थामे हुए थीं, जिससे “घर-घर तिरंगा” का संदेश पूरे नगर में गुंजायमान हो गया।
शाम 4 बजे परंपरानुसार मंदिर के सभामंडप में शासकीय पुजारी पं. घनश्याम शर्मा द्वारा भगवान श्री चंद्रमौलेश्वर का षोडशोपचार पूजन-अर्चन किया गया। पूजन के समय प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल, राज्यमंत्री कृष्णा गौर, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा, नगर निगम सभापति कलावती यादव, कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा सहित कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। पूजन और आरती के बाद पालकी को कंधा देकर नगर भ्रमण के लिए रवाना किया गया।
पंचम सवारी में भगवान महाकाल पांच अलग-अलग स्वरूपों में भक्तों को दर्शन दे रहे थे—पालकी में श्री चंद्रमौलेश्वर, गजराज पर श्री मनमहेश, गरुड़ रथ पर शिवतांडव, नंदी रथ पर श्री उमा-महेश और डोल रथ पर होल्कर स्टेट के मुखारविंद। जैसे ही पालकी मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंची, रजत पालकी में विराजित भगवान को सशस्त्र पुलिस बल ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया।
सवारी परंपरागत मार्ग से गुजरते हुए रामघाट पहुंची, जहां मां क्षिप्रा के पवित्र जल से भगवान का अभिषेक और पूजन हुआ। अभिषेक के उपरांत आरती की गई और सवारी ने रामानुजकोट, कार्तिक चौक, खाती का मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, छत्री चौक, गोपाल मंदिर होते हुए अपना नगर भ्रमण जारी रखा। गोपाल मंदिर में सिंधिया ट्रस्ट के पुजारियों ने पालकी का विशेष पूजन किया। अंततः सवारी पटनी बाजार और गुदरी चौराहे से होती हुई वापस महाकाल मंदिर पहुंचकर विश्राम को गई।
इस बार की सवारी में सांस्कृतिक रंग भरने के लिए चार जनजातीय कलाकार दलों ने विशेष प्रस्तुति दी। बैतूल से गोंड जनजातीय ठाट्या नृत्य, खजुराहो से कछियाई लोक नृत्य, दमोह से बधाई लोक नृत्य और डिंडोरी से गेड़ी जनजातीय नृत्य के कलाकार नृत्य-गीत के साथ सवारी के साथ-साथ चलते रहे। इन प्रस्तुतियों ने भक्तों और दर्शकों का मन मोह लिया।
धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सवारी में मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों की झांकियां भी शामिल की गईं। इनमें ओरछा का श्री राजाराम लोक, मां बगलामुखी मंदिर, मां शारदा शक्तिपीठ मैहर और मां बिजासन धाम सलकनपुर की प्रतिकृतियां प्रमुख आकर्षण रहीं।
श्रावण-भादौ माह की सवारी परंपरा का यह सिलसिला अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। आगामी 18 अगस्त को अंतिम और राजसी सवारी निकलेगी, जिसमें 70 से अधिक भजन मंडलियां और परंपरागत रथ—श्री चंद्रमौलेश्वर की पालकी, हाथी पर श्री मनमहेश, गरुड़ रथ पर शिवतांडव, नंदी रथ पर उमा-महेश, और डोल रथ पर श्री सप्तधान एवं होल्कर स्टेट के मुखारविंद—शोभायमान होंगे। उस दिन महाकाल नगरी एक बार फिर आस्था, परंपरा और भव्यता के चरम पर होगी।